शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014
इदं लोकसभां स्वाह:।
रविवार, 9 फ़रवरी 2014
गाँधी और नेहरु की लगाई आग में जल रहा है हिंदुस्तान ?
बात इसी बसंत पंचमी कि है जब पुरे बिहार में माता सरस्वती कि पूजा धूम धाम से मनाई जा रही थी छात्र छात्राए माता कि आराधना में लीन थे और उसके बाद गाजे बाजे के साथ माँ के विसर्जन कि तयारी चल रही थी लेकिन कोई नहीं जनता था कि १९४७ में द्वि राष्ट्र वाद के सिद्धांत पर जो समझौता हुआ उसका खामियाजा नई पीढ़ी को उठाना पड़ेगा पुरानी घटनाओ पर जाये तो विगत कुछ वर्षो में बिहार ,उत्तर प्रदेश , झारखण्ड सहित कई राज्यो के मुश्लिम बहुल इलाको में विभिन्य धार्मिक आयोजनो के बाद निकलने वाले सोभा यात्रा पर हमला आम बात हो गई है ऐसा ही कुछ इस बार बड़े पैमाने पर बिहार में देखने को इस बार मिला जहा विसर्जन में निकलने वाले जुलुश पर पथराव किया गया ,मार पिट कि गई यही नहीं गोलीबारी तक हो गई बिहार के अररिया मधेपुरा , फारबिसगंज ,सीतामढ़ी सहित कई इलाको में ऐसी घटनाये घटी जिसपर समय रहते काबू तो पा लिया गया लेकिन इन घटनाओ में जहा २ लोगो कि मौत हो गई वही ५० से अधिक लोग घायल हो गए आखिर ये क्या है ? क्या सहिष्णुता जैसे सब्द किसी एक वर्ग के लिए ही बनाये गए है या फिर हिन्दू मुश्लिम भाई भाई जैसे नारे देकर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए गड्ढे खुद खोद रहे है क्योकि विगत वर्षो में जिस तरह के हालत देखने को मिल रहे है उससे तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ? यह ठीक है कि भारत के सविधान ने सभी नागरिको को सामान रुप से अधिकार प्रदान किये है लेकिन इसका कितना पालन हो रहा है क्या उसपर चर्चा कि आवश्यकता नहीं वोट बैंक कि राजनीती के तहत हिन्दुओ को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रख दिया है नेताओ ने क्योकि हिन्दू कभी वोट बैंक नहीं बन पाये १९४७ के बाद से आज तक कश्मीर हो आसाम हो केरल हो सभी स्थानो पर बहुसंख्यक मुश्लिम वर्ग द्वारा हिन्दुओ का सोशन आम बात है गांधी और नेहरू क प्रेम ने ऐसी आग लगाई कि धर्म के आधार पर बटवारे के बाद भी आज तक शांति स्थापित नहीं हो पाई इस लिए अब खुले आम यह नारा लगाया जाता है “लड़ के लिए पाकिस्तान हस कर लेंगे हिंदुस्तान ” ? अब इसके बाद क्या नारा दिया जायेगा यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा .
शनिवार, 1 फ़रवरी 2014
क्या लालू और कांग्रेस पार्टी जबाब देगी ?
कांग्रेस हमेसा से चाहती थी कि देश टुकड़ो में विभाजित रहे ताकि वो सत्ता सुख भोगते रहे और यही हो रहा है जब देश में महंगाई भ्रटाचार गरीबी अशिक्षा आतंकवाद जैसे मुद्दे हावी हो रहे थे तो तत्काल राहुल गांधी ने सिख दंगो पर बहस छेड़ दी जिसका नतीजा हुआ कि गुजरात दंगो पर भी चर्चा चल निकली। साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता पर पर सवाल खड़े किये जाने लगे कांग्रेस नेता गुजरात दंगो कि बात करते है लेकिन गुजरात दंगो का कारन क्या था और गोधरा में कार सेवको कि हत्या किसने कि इस पर बात करने से कतराते है आखिर नानावटी आयोग कि जाच को ख़ारिज कर लालू प्रसाद यादव ने जिस सप्रंग 1 के दबाब में बनर्जी कमीसन को बनाया उसने कैसे सबूतो से खिलवाड़ किया इसका भी जबाब देश जानना चाहता है ? 2004 में कांग्रेस जैसे ही सत्ता में आई सबसे पहले उसने लालू प्रसाद यादव जो तत्कालीन रेल मंत्री थे पर दबाब बनवा कर गोधरा कांड के जाच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज उमेश चन्द्र बनर्जी के नेतृत्व में बनर्जी कमिसन बनवाया जिसने साबरमती ट्रैन में हुए कारसेवको कि मौत का कारन मानवीय भूल बताया। क्योकि हाजी बिलाल जो कि कांग्रेस नेता था उसे सजा से बचाना इनका मकसद था। गौरतलब हो कि गोधरा में 59 हिन्दुओ के मारे जाने के बाद ही गुजरात में दंगा भड़का था। उसके बाद कांग्रेस ने पोटा हटा दिया बाद में 17 मार्च 2002 को मुख्य संदिग्ध हाजी बिलाल , एक स्थानीय नगर पार्षद और एक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समर्थक को गोधरा में एक आतंकवाद विरोधी दस्ते ने गिरफ्तार कर लिया बिलाल ने भी गिरोह के नेता लतीफ के साथ पाकिस्तान में कई बार कराची का दौरा किया था वही कई आरोपी बंगाल के रास्ते बंगलादेश भागने में सफल हो गए थे ? कोर्ट ने बनर्जी कमीशन के बातो को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया और नानावटी साह कमीसन के जाच को तरजीह देते हुए फरवरी 2011 को निचली अदालत 31 लोगों को दोषी करार दिया और इस घटना को एक ” पूर्व नियोजित षड्यंत्र माना। राज्य सरकार ने फैसले के खिलाफ आरोपिओ को फासी देने कि मांग कि है ?क्या इसका जबाब कोई कांग्रेस नेता देगा कि क्यों आज तक गोधरा और सिख दंगो पर बचते फिरते है। बार बार दंगो के नाम पर मुश्लिम तुष्टिकरण कर वोट कि फसल काटने वाले किसी कांग्रेसी राजद सपाई बसपाई के पास इसका जबाब नहीं है ?
सोमवार, 20 जनवरी 2014
गणतंत्र के बहाने लोकतंत्र पर प्रहार ?
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर लिखने का मन तो नहीं करता लेकिन इनकी सच्चाई से देश दुनिया को अवगत करवाने के लिए लिखना पड़ रहा है। कुछ पुलिस वालो के तबादले को लेकर धरना पर बैठे केजरीवाल आम आदमी के ऐसे नेता है जो आम आदमी के नाम पर आराजकता फैला रहे है। 20 दिन के मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा किये जा रहे धरने से पूरी दिल्ली में अराजकता का जिस प्रकार माहोल बना है उससे दिल्ली कि सुरक्षा भी खतरे में है। देश कि राजधानी पर आतंकी साया पहले से ही मडरा रही है उसपर सारी व्यवस्था धरना स्थल पर लगी हुई है वही केजरीवाल का ताजा बयान भी चौकाने वाला है जिसमे उन्होंने कहा है कि गणतंत्र दिवस नहीं मनाने देंगे जो कि इस बात का द्दोतक है कि इन्हे लोकतंत्र पर विश्वाश है ही नहीं ये सिर्फ भारत कि अखंडता को खंडित करने में लगे है गणतत्र दिवश हम हिंदुस्तानिओं के लिए त्यौहार से कम नहीं है इस मौके पर पुरे विश्व से लोग दिल्ली पहुचते है जहा से हमारी संस्कृति हमारी विरासत कि झलक संपूर्ण विश्व पटल पर पहुचती है लेकिन गणतत्र दिवस से ठीक पहले अपने मंत्रियो के बचाव में किये जा रहे इस कुकृत धरने से पूरी दिल्ली अशांत करने कि साजिश इन नेताओ द्वारा रची जा रही है ? यह ठीक है कि दिल्ली पुलिस को राज्य के अधीन होना चाहिए यह भी सच है कि पुलिस तंत्र में बड़े पैमाने पर भ्रस्टाचार कायम है लेकिन मुख्य मंत्री का पद केजरीवाल के पास है और इन मांगो को केजरीवाल विधान सभा में प्रस्ताव पारित करके भी मांग सकते है इसके लिए सड़क पर कि जा रही इस प्रकार कि नौटंकी ऐसे समय में जब अनेक देशो के प्रतिनिधि गंततंत्र दिवस में सामिल होने भारत आ रहे हो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। फोर्ड और आवाज जैसी संस्थाओ से प्राप्त राशि के बल सड़क पर नेतागिरी कि दुकानदारी चला रहे केजरीवाल भारत कि गरिमा को धूमिल करने के प्रयास में लगे हुए है क्योकि धरना स्थल के करीब जिस प्रकार से खाली शराब कि बोतल मिली है इससे समझा जा सकता है कि इनके साथ कौन लोग है इनके मंत्री जहा कश्मीर में जनमत सर्वेक्षण के बात कर पाकिस्तान से बाहवाही लूटते है वही ये गणतत्र दिवस समारोह ना होने देने कि चेतावनी देते है संविधान कि कसम खा कर मुख्यमंत्री बने केजरीवाल संविधान कि गरिमा को तार तार करने में लगे हुए है जब मुख्य मंत्री धारा 144 तोड़ कर संविधान का उलंघन करे तो फिर जनता में क्या सन्देश जाता है ?आज इनकी वजह से दिल्ली के लाखो लोग परेसानी झेल रहे है जिस पुलिस वाले को दिन रात गाली दे रहे है उन्ही कि सुरक्षा घेरे में ये रात भर सोते रहे और बेचारे पुलिस वाले इनकी पहरेदारी में खड़े रहे क्या इन पुलिस वालो का मानवाधिकार नहीं है लेकिन सत्ता के मद में डूबे केजरीवाल को इसकी चिंता कतई नहीं है क्योकि इनका मकसद तो कुछ और ही है जो जल्द ही प्रकट होगा ?#aap
मंगलवार, 3 दिसंबर 2013
बिहार में नक्सली तांडव ?
नक्सलियो ने बिहार में एक सप्ताह के अंदर दूसरा हमला किया इन हमलो में अब तक 8 जवानो कि असमय मौत हो गई ऐसा नहीं है कि यह हमला बहुत दिनों के अंतराल में किया गया हो नक्सली आये दिन हमले कर बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे है हलाकि उन हमलो कि आवाज सत्ता प्रतिष्ठान के कान के नसो को झकझोर नहीं पाती थी लेकिन मुंगेर के जमाल पुर में हुए इंटर सिटी एक्सप्रेस और औरंगाबाद में पुलिस गस्ती पर हुए ताजा हमलो कि गूंज पटना ही नहीं पुरे देश तक पहुँच गई है। पिछले कुछ दिनों से नक्सलियो ने बिहार में अपना खुनी तांडव तेज कर दिया है लेकिन बिहार सरकार तमाम ख़ुफ़िया जानकारी रहने का दावा करने के बावजूद इनके नेटवर्क को भेद पाने में पूरी तरह असफल है। मुख्य मंत्री नितीश कुमार के जिम्मे प्रदेश का गृह विभाग भी है लेकिन अठारह विभागो के बोझ तले नितीश कुमार कुछ भी करने में असमर्थ दीखते है कही ना कही उनके कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठना लाजिमी है कि जब बिहार के एक दर्जन से अधिक जिले नक्सल प्रभावित हो उसके बाद भी इस समस्या का हल निकालने के लिए कोई ठोस निति आज तक क्यों नहीं बनाई गई ? गौरतलब हो कि बिहार सरकार ने अन्य नक्सल प्रभावित राज्यो कि तरह बिहार में ऑप्रेशन ग्रीन हंट की मंजूरी नहीं दी है ? जिसका लाभ यहाँ के नक्सली उठाते है और अगर ख़ुफ़िया सूत्रो कि माने तो पिछले साल कि तुलना में इस साल बिहार में नक्सलियो का हमला कई गुना अधिक बढ़ चूका है इस साल अब तक लगभग 60 से अधिक जवान और नागरिक इन हमलो में मारे जा चुके है वही हथियारो कि लूट भी बड़े पैमाने पर हुई है गौरतलब हो कि पुरे देश में नक्सलियो ने जितने हथियार सुरक्षा बलो से छिने है उसका 50 फीसदी अकेले बिहार से छीना गया है वही बिहार पुलिस के हौसले पूरी तरह पस्त है और 2013 में एक भी नक्सली को पुलिस मार गिराने में अब तक सफल नहीं हो पाई है इसके बावजूद भी बिहार सरकार के गृह विभाग कि कुम्भकर्णी निंद्रा नहीं टूटी है और नक्सल प्रभावित जिलो में नक्सलियो के सफाये के लिए कोई अभियान नहीं चलाया जा रहा है ? आखिर क्या है सरकार कि नक्सल निति वो मारते रहे और हमारे जवान और नागरिक भेड़ बकरी कि तरह मरते रहे ? क्यों नहीं दी गई यहाँ ऑप्रेशन ग्रीन हंट जैसे अभियानो को मंजूरी ? एक साल में क्यों नहीं मरा एक भी हमलावर ? ऐसे में सरकार राज्य के नागरिको की सुरक्षा के प्रति कितनी चिंतित है यह समझा जा सकता है।
सोमवार, 25 नवंबर 2013
नितीश सरकार के आठ साल का सच ?
बिहार कि नितीश सरकार ने आठ साल पुरे कर लिए है जिसका रिपोर्ट कार्ड आज बड़ी गर्म जोशी से इन्होने जारी किया और सरकार कि उपलब्धिया गिनवाई है जिसमे सभी मोर्चे पर सरकार कि सफलता का गुणगान किया गया है लेकिन इसकी जमीनी सच्चाई क्या है ? अगर इन आठ वर्षो के शासन व्यवस्था का मुल्यांकन पहले पाच वर्षो को छोड़ कर किया जाए तो नतीजा शून्य निकलता है। बिहार का आम नागरिक होने के नाते सरकार के इन तीन वर्षो के कार्यकाल पर यही कहा जा सकता है की "हाथी के दाँत दिखाने के और खाने को अलग अलग होते है " वाली कहावत पूरी तरह यहाँ चरितार्थ हुई है ? शिक्षा , स्वास्थ्य , कानून व्यवस्था के साथ साथ पेयजल, परिवहन , बिजली का जितना ढिंढोरा पीटा जा रहा है जमीन पर कही नजर नहीं आता। जहा देखो बाबुओ का राज कायम है। उच्य शिक्षा अपनी बदहाली पर आसुँ बहा रही है कॉलेज में शिक्षक नहीं है ,स्कुल में शिक्षक है तो उन्हें जनवरी फरबरी लिखना नहीं आता अस्पताल में बड़े बड़े बिल्डिंग बना गए लेकिन बिना चिकित्सक के सफ़ेद हाथी बने हुए है।सदर अस्पताल रेफरल अस्पताल बने हुए है मरीज असमय काल के गाल में जाने पर विवश है कानून व्यवस्था कि बात करे तो चोरी ,लूट , बलात्कार ,हत्या का ग्राफ बड़े पैमाने पर बढ़ा है ग्रामीण जलापूर्ति योजना अपनी बदहाली पर आसुँ बहा रही है। सहरी क्षेत्र में उचे ऊचे जलमीनार शोभा कि वस्तु बने हुए है। परिवहन कि बात करे तो प्राइवेट बस मालिको ने लूट मचा रखा है। मनमाना किराया इनके द्वारा उसुला जा रहा है बिजली कि बात करना आवश्यक है क्योकि गाव में आठ घंटे बिजली देने कि घोषणा बड़े जोर शोर से करते है मुख्यमंत्री जी लेकिन खुद इनके विधायक के गाव में तीन साल हो गए बिजली नहीं पहुची तमाम विभागो में भ्रस्टाचार का बोलबाला कायम है बस अब बिहार सूर्य अस्त होते ही मस्त हो जाता है क्योकि विकाश कही नजर आता है तो दारु के ठेके पर नजर आता है जो आज गली गली में खुल गए है ?
गुरुवार, 21 नवंबर 2013
रोटी और बेटी ?
भारत और नेपाल का सम्बन्ध कभी रोटी और बेटी का हुआ करता था लेकिन अब समय बदल चूका है ? नेपाल में राजशाही कि समाप्ति के बाद जब से माओवादिओं ने सत्ता सम्भाली तब से ही नेपाल भारत विरोधी गतिविधिओ का मुख्य केंद्र बन गया क्योकि माओवादी चीन के करीबी थे और चीन हमारा परम्परागत दुश्मन . नेपाल के रास्ते बड़े पैमाने पर मादक पदार्थो कि तश्करी के साथ साथ जाली नोट और आतंकी गतिविधिओ का सञ्चालन माओवादिओं के संरक्षण में होने के कई मामले सामने आये लेकिन भारत सरकार द्वारा कोई ठोश कदम नहीं उठाया गया ? यही नहीं नेपाल में माओवादिओं द्वारा भारत विरोधी नारे चीन को खुश करने के लिए लिखे गए सूत्रो कि माने तो नेपाल कि जमीन पर चीन भारत विरोधी गतिविधिओ को अंजाम देने के लिए राशि भी उपलब्ध करवाता है साथ ही भारत कि सीमा तक सडको के जाल चीन के रूपये से बिछा दिए गए है और अब एक बार फिर जो हालात नेपाल चुनाव के बाद उभर कर सामने आ रहे है उनपर विचार करने कि अवसयकता है ? क्योकि नेपाल चुनाव २०१३ में माओवादी नेता प्रचंड कि जबर्दस्त हार हुई है और प्रचंड ने चुनाव बहिस्कार कि धामी दे डाली है यदि प्रचंड सत्ता से बेदखल होते है तो इसके गम्भीर परिणाम नेपाल में देखने को मिलेंगे माओवादी एक बार पुनः नेपाल में सक्रिय हो सकते है या फिर नेपाल में सत्ता विरोधी आंदोलन यदि होते है तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा इसलिए भारत सरकार को नेपाल के हालातो पर नजर रखने कि आवश्यकता है ताकि वह लोकतंत्र बहाल रहे और नेपाल से जो रोटी और बेटी का सम्बन्ध शदियों से चला आ रहा है उसपर खतरा ना मंडराए ?
बुधवार, 30 अक्टूबर 2013
एक दोस्त कि कहानी ?
एक दोस्त कि कहानी ?
अचानक ही सड़क से गुजरते वक्त नजर एक रिक्से वाले पर पड़ी देखा तो चौक गया क्योकि वो मेरे बचपन का मित्र श्याम था लेकिन श्याम रिक्सा चला रहा था ये बात कुछ समझ में नहीं आई आखिर इतना बुरा दिन कैसे आ गया श्याम का उससे पूछने और नजर मिलाने कि हिम्मत भी नहीं हो रही थी तब तक वो सवारी लिए आगे बढ़ चूका था और मुझे भी अपने काम में जाना था तो आगे बढ़ गया लेकिन पूरा दिन मस्तिष्क इसी उधेड़ बुन में लगा रहा कि आखिर श्याम कि ऐसी हालत क्यों हो गई साम में अन्य मित्रो से पता करने कि कोसिस कि तो पता चला कि जो श्याम १० वी कक्षा में ही में १०० रूपये कि नोट में तम्बाकू लपेट कर सिगरेट कि तरह पीता था अपनी साह खर्ची कि वजह से आज ऐसी स्थति पर पहुच गया कि दो जून कि रोटी के लिए रिक्शा चलाने पर मजबूर है . एक समय था जब श्याम को सभी मित्रो से अधिक पॉकेट मनी उसके पापा देते थे उसके पापा मछली के थोक व्यवसाई थे और सहर में उनकी अच्छी पहुच थी लेकिन उनकी मृत्यू के बाद श्याम अपनी साह खर्ची कि वजह से बने बनाये धंधे को बर्बाद करने के बाद अब पेट भरने के लिए रिक्सा चला रहा है . दोस्तों यह एक सच्ची घटना है और मुझे लगता है कि हमें इससे बहुत कुछ सिखने कि आवश्यकता है . अपने बहुमूल्य विचार जरुर दे कि में उस बचपन के मित्र के लिए क्या करू जिससे कि उसकी जिंदगी पुनः पटरी पर दौड़े
अचानक ही सड़क से गुजरते वक्त नजर एक रिक्से वाले पर पड़ी देखा तो चौक गया क्योकि वो मेरे बचपन का मित्र श्याम था लेकिन श्याम रिक्सा चला रहा था ये बात कुछ समझ में नहीं आई आखिर इतना बुरा दिन कैसे आ गया श्याम का उससे पूछने और नजर मिलाने कि हिम्मत भी नहीं हो रही थी तब तक वो सवारी लिए आगे बढ़ चूका था और मुझे भी अपने काम में जाना था तो आगे बढ़ गया लेकिन पूरा दिन मस्तिष्क इसी उधेड़ बुन में लगा रहा कि आखिर श्याम कि ऐसी हालत क्यों हो गई साम में अन्य मित्रो से पता करने कि कोसिस कि तो पता चला कि जो श्याम १० वी कक्षा में ही में १०० रूपये कि नोट में तम्बाकू लपेट कर सिगरेट कि तरह पीता था अपनी साह खर्ची कि वजह से आज ऐसी स्थति पर पहुच गया कि दो जून कि रोटी के लिए रिक्शा चलाने पर मजबूर है . एक समय था जब श्याम को सभी मित्रो से अधिक पॉकेट मनी उसके पापा देते थे उसके पापा मछली के थोक व्यवसाई थे और सहर में उनकी अच्छी पहुच थी लेकिन उनकी मृत्यू के बाद श्याम अपनी साह खर्ची कि वजह से बने बनाये धंधे को बर्बाद करने के बाद अब पेट भरने के लिए रिक्सा चला रहा है . दोस्तों यह एक सच्ची घटना है और मुझे लगता है कि हमें इससे बहुत कुछ सिखने कि आवश्यकता है . अपने बहुमूल्य विचार जरुर दे कि में उस बचपन के मित्र के लिए क्या करू जिससे कि उसकी जिंदगी पुनः पटरी पर दौड़े
रविवार, 20 अक्टूबर 2013
पाकिस्तान का अंत हम भारतीयों का सपना ?
वर्ष १९४७ भारत का बटवारा एक अलग देश पाकिस्तान का जन्म हम भारतीयों ने सोचा सायद इन्हें अब शांति मिल जाएगी लेकिन यह तत्कालीन हुक्मरानो की बहुत बड़ी भूल साबित हुई और उनकी भूल का खामियाजा हम आज 67 वर्ष बीत जाने के बाद भी भुगत रहे है कहने को तो दुनिया के तमाम देशो ने पाकिस्तान को एक आतंकी मुल्क घोषित कर दिया लेकिन परोक्ष रूप से इन्ही मुल्को ने पाकिस्तान को पूरी दुनिया में आतंक फ़ैलाने की छुट दे रखी है क्योकि पाकिस्तान इन देशो से बड़े पैमने पर हथियार खरीदता है जिसका उधारण हमने अनेको मामले में देखा और परखा है ? जवाहर लाल नेहरु से लेकर वर्त्तमान प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह तक ने पाकिस्तान से समय समय पर समझौते किये लेकिन पाकिस्तान द्वारा तमाम समझौतों को दरकिनार किया गया और हम मूकदर्शक बन देखते रहे शिमला समझौता हो या आगरा समझौता लेकिन पाकिस्तान ने अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ी . नियंत्रण रेखा पर बार बार अतिक्रमण और युद्ध विराम का उलंघन करके पाकिस्तान ने अपनी नियत को जाहिर किया और हम दोस्ती का एकतरफा प्रयाश करते रहे खोखली चतावनी देते रहे लेकिन उनके द्वारा हमले और तेज कर दिए गये जिसका नतीजा है की आज कश्मीर का बड़ा भू भाग उनके कब्जे में है जहा से आतंकी गत्विधियो का सञ्चालन बड़े पैमाने पर हो रहा है हमारे जवान सरकार की नपुंसकता की वजह से मारे जा रहे है जबकि हम बार बार सुरक्षा परिषद् और अमरीका के सामने गुहार लगाते रहे है क्या यह हमारी सुरक्षा और विदेश निति पर सवालिया निसान नहीं खड़े करता ऐसे में जब आये दिन पाकिस्तान द्वारा युद्ध विराम का उलंघन करके नियंत्रण रेखा पर फायरिंग की जा रही हो जवानो के साथ साथ निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हो तब क्या बात चित से समस्या का हल संभव है मेरे विचार से नहीं क्योकि " लातो के भुत बातो से नहीं मानते "हो सकता है आप मेरे विचारो से सहमत ना हो लेकिन यही सच है आप में से कुछ कहेंगे युद्ध समस्या का समाधान नहीं है ? युद्ध से महंगाई बढ़ेगी ? तो भैया आज भी महंगाई कहा कम है याद कीजये लाल बहादुर शास्त्री जी , इंद्रा गाँधी और अटल बिहारी बाजपाई जी को जिन्होंने पाकिस्तान और चीन को छटी का दूध याद दिलाया था और आम जनता से अपील की थी एक समय का भोजन बचाने की और हम युद्ध में विजयी हुए थे 90000 हजार पाकिस्तानी सैनिको को बंदी बनाया गया था . विश्व में सबसे अधिक युवाओ वाले देश है हम और हमारे युवा जब सेना में नौकरी के लिए घुश देते हो तो समझये युवाओ की भावना को जब सरीर का एक अंग ख़राब हो जाता है तो उसे डॉक्टर काट कर हटा देते है की कही बीमार अंग अन्य अंगो को भी ख़राब ना कर दे यहाँ पाकिस्तान हमारा पडोसी है जो बार बार हमारे सैनिको पर हमले कर रहा है देश का युवा अब यही सपना देखता है भले एक समय भूखा रहना पड़े लेकिन ऐसे पडोशी का अंत होना चाहिए . "अब नगाड़ा बज चूका है सीमा पर सैतान का नक्से पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का " वन्दे मातरम
गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013
बिहार की राजनीती के एक अध्याय का अंत ?
बिहार की राजनीती में धुर्ब तारा बन कर उभरे राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की राजनीती का आज अंत हो गया उनका राजनितिक केरियर लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया क्योकि सर्वोच्य नयायालय के आदेश के अनुसार अब वो चुनाव नहीं लड़ पाएंगे गौरतलब हो की बहुचर्चित 956 करोड़ के चारा घोटाला मामले में सी बी आई कोर्ट ने लालू यादव को 5 साल की सजा
के साथ साथ 25 लाख का जुर्माना सुनाया वही जे डी यू सांसद जगदीश शर्मा और ;जगरनाथ मिश्र को भी 4 - 4 साल की सजा सुनाई गई है ? बिहार में माय ( मुश्लिम + यादव ) समीकरण के जरिये सत्ता तक पहुचे लालू यादव ने कभी " भूरा बाल साफ़ करो "जैसे नारे देकर समाज को तोड़ने का जो काम किया था इससे उसका भी अंत हो गया यही नहीं लाल कृष्ण आडवानी की रथ यात्रा को समस्तीपुर में रोक कर तो वो रातो रात मुश्लिम रहनुमा गए थे समाज वाद का सबसे बड़ा पहरुआ भी लालू स्वयं को बताने में पीछे नहीं रहे बहुबल धन बल के साथ साथ तमाम विवादों से लालू का पुराना रिश्ता रहा रेल मंत्री बनाने के बाद लालू ने कई बदलाव कर जनता के दिल को जितने की कोसिस की लेकिन पुराने मित्र नितीश कुमार ने पटखनी देकर सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया उसके बाबजूद संघ विरोध की राजनीती करके बिहार में सत्ता के एक प्रमुख केंद्र बने रहे लालू यादव प्रधान मंत्री बनने का सपना पाले बैठे रहे लेकिन सायद लालू यादव भूल गए की कानून भी कोई चीज़ है इस फैसले से बिहार ही नहीं देश की जनता का भी विस्वाश न्यायिक प्रक्रिया पर बढ़ा है और फैसले ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया भारत की न्यायिक प्रक्रिया में विलंब हो सकता है लेकिन कोई मुजरिम जुर्म करके बच नहीं सकता अब हम बिहारिओ को 22 nov का इंतजार है जब इसी मामले में वर्त्तमान मुख्या मंत्री नितीश कुमार और शिवानन्द तिवारी जिनपर मिल कर 1 . 5 करोड़ रूपये लेने का आरोप है
के साथ साथ 25 लाख का जुर्माना सुनाया वही जे डी यू सांसद जगदीश शर्मा और ;जगरनाथ मिश्र को भी 4 - 4 साल की सजा सुनाई गई है ? बिहार में माय ( मुश्लिम + यादव ) समीकरण के जरिये सत्ता तक पहुचे लालू यादव ने कभी " भूरा बाल साफ़ करो "जैसे नारे देकर समाज को तोड़ने का जो काम किया था इससे उसका भी अंत हो गया यही नहीं लाल कृष्ण आडवानी की रथ यात्रा को समस्तीपुर में रोक कर तो वो रातो रात मुश्लिम रहनुमा गए थे समाज वाद का सबसे बड़ा पहरुआ भी लालू स्वयं को बताने में पीछे नहीं रहे बहुबल धन बल के साथ साथ तमाम विवादों से लालू का पुराना रिश्ता रहा रेल मंत्री बनाने के बाद लालू ने कई बदलाव कर जनता के दिल को जितने की कोसिस की लेकिन पुराने मित्र नितीश कुमार ने पटखनी देकर सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया उसके बाबजूद संघ विरोध की राजनीती करके बिहार में सत्ता के एक प्रमुख केंद्र बने रहे लालू यादव प्रधान मंत्री बनने का सपना पाले बैठे रहे लेकिन सायद लालू यादव भूल गए की कानून भी कोई चीज़ है इस फैसले से बिहार ही नहीं देश की जनता का भी विस्वाश न्यायिक प्रक्रिया पर बढ़ा है और फैसले ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया भारत की न्यायिक प्रक्रिया में विलंब हो सकता है लेकिन कोई मुजरिम जुर्म करके बच नहीं सकता अब हम बिहारिओ को 22 nov का इंतजार है जब इसी मामले में वर्त्तमान मुख्या मंत्री नितीश कुमार और शिवानन्द तिवारी जिनपर मिल कर 1 . 5 करोड़ रूपये लेने का आरोप है
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