अखबार से लेकर टीवी तक मे आज सिर्फ हिंसा की खबर सुर्खिया बटोर रही है , सिनेमा भी हिंसा पर केन्द्रित करके ही बनाई जा रही है जिसका नतीजा है कि हम हिंसक हो रहे है ।अपराध करने के बाद अपराधी को सजा दे देना बहुत नही है ।अपराध की प्रवृति ने अपराधी के मन मस्तिष्क मे जन्म कैसै लिया इसकी भी सुक्ष्मता से जाॅच करने की आवश्यकता है ताकि अपराध को जङ से समाप्त किया जा सके । आज देश मे किसी घटना के घटित होने के बाद चंद दिनो तक खुब चर्चा होती है और अपराध करने वाले को कठोरत्तम सजा दिए जाने की बात पुरजोर तरीके से उठाई जाती है लेकिन इसपर चर्चा नही होती कि अमुक व्यक्ति ने जो अपराध किया उस स्थिति तक वो क्यो और कैसै पहुचा हलाकि समाज में अपराधिक घटना घटित होना कोई नई बात नहीं है लेकिन विगत वर्षो में जिस प्रकार के अपराध हो रहे है उससे मानव जाति भी शर्मा जाए । ऐसे ऐसे अपराधी और अपराध की ऐसी मनोवृति की लोग सुन कर ही सहम जाते है अपराध का ऐसा वीभत्स रूप देखने को मिल रहा है की चर्चा करना नामुनकिन है , जिसपर समय रहते विचार करने की आवश्यकता है ताकि हमारी जो सभ्यता संस्कृति के साथ साथ गौरवशाली इतिहास रही है उसे बचाया जा सके। देश जैसे जैसे विकास की और आगे बढ़ रहा है दूसरी और उतनी ही तीव्रगति से नैतिक पतन हो रहा है कहने को हम चाँद तारो तक पहुँच गए है लेकिन दिनोदिन हमारी मानसिकता उतनी ही निचे होती जा रही है सरेराह चलती युवती को कुछ लोग उठा कर वीभत्स तरीके से दुष्कर्म के बाद हत्या कर देते है और हम मोमबत्ती हाथो में लिए उन्हें सिर्फ सजा देने की मांग कर अपने कर्तव्यो का इतिश्री कर देते है फिर जिंदगी पटरी पर दौड़ने लगती है ऐसा मह्सुश ही नहीं होता की कल कुछ हुआ भी था ऐसी मानसकिता ने धीरे धीरे हमारे अंदर घर बनाना आरम्भ कर दिया है और तो और हम सरकार और पुलिस पर ही निर्भर हो चुके है जिसकी वजह से अपराध पर लगाम नहीं लग पा रहा है जबकि हमें चाहिए की अपराध और अपराधी की जड़ तक जाए और कारणों का पता करे की किन वजहों से किस परिस्थिति में ऐसी घटना को अपराधी ने अंजाम दिया। जहा तक मेरा मानना है की कोई भी व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं होता देश काल परिस्थिति रहन सहन व्यक्ति को अपराधी बना देती है आज जिस प्रकार की स्वक्षन्द्ता हमारे और आप के जीवन में आ चुकी है वही स्वक्षन्द्ता और खुलापन ही तमाम अपराध के मूल में है । खुलेपन ने हमारी संस्कृति को नष्ट करने का बीड़ा उठाया हुआ है जिसपर यदि हम चर्चा करते है तो हमें पुरातनपंथी कहा जाता है यही नहीं और ना जाने कितने नामांकरण किये जाते है। इंटरनेट मोबाइल में जब पोर्न पिक्चर देखते है तो उससे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उत्तेजित होता है उत्तेजना को शांत करने के लिए व्यक्ति तरह तरह के प्रयोग करता है जिससे अपराध का जन्म होता है जिसपर बहुत कम लोग ही ध्यान देते है साथ ही सिनेमा में दिखाई जाने वाली हिंसात्मक दृश्यों का भी बहुत असर देखने को मिलता है जिससे बच्चे अपराध की और जाने पर विवश हो रहे है लेकिन हम स्वयं को आधुनिक कहलाना पसंद करने की खातिर इन विषयो से मुँह मोड़ कर सिर्फ मोमबत्ती जुलुश निकाल कर अपने कर्तव्यो से इतिश्री कर ले रहे है जबकि जरुरत है ऐसे हिंसा और उत्तेजना फ़ैलाने वाले विषयवस्तु के खिलाफ मोमबत्ती जुलुश निकाले जाने की ताकि अपराध को जड़ से समाप्त किया जा सके /
मंगलवार, 21 जुलाई 2015
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015
वो रंडी है ?
रंडी शब्द सुनते है तथाकथित सभ्य समाज अपनी भौ तान लेता है घूर घूर कर आप को देखने लग जाता है ऐसे घृणा और हेय की दृष्टि से देखा जाता है जैसे आप ने कुछ ऐसा कह दिया हो जो कल्पना से परे है लेकिन आखिर रंडी शब्द या नाम आया कहा से आसमान से तो आया नहीं ये नाम भी तो हम और आप में से किसी एक ने ही दिया होगा तो आखिर इस नाम से इतनी घृणा क्यों ? जैसे जैसे समय बदला परिस्थितिया बदली हम और आप बदले उसी प्रकार इनका नाम भी बदला लेकिन इनकी हालत में कोई सुधार आज तक ना हुआ कहने को तो हम चाँद तारे और मंगल की शैर कर आये लेकिन हमारे ही समाज में रहने वाली जिन्हे हम पहले रंडी या वैश्या के नाम से जानते थे अब वो सिर्फ कॉल गर्ल ,में परिवर्तित हो गया है चाहे देश के किसी सहर में चले जाये वैश्या घर अर्थात चकला घर आप को मिल जायेगा जहा पुरुष अपनी काम पिपासा को शांत कर चुपके से निकल आता है और फिर सभ्य बना घूमता है लेकिन ये पहले भी असभ्य कहलाती थी आज भी असभ्य और हेय ही कहलाती है। इसी देश के चकला घरो में लाखो लडकिया कुछ स्वेक्षा से तो कुछ जबरन देह व्यपार के धंधे में धकेल दी जाती है जिन्हे ढकेलने वाला कोई दूसरा नहीं हम और आप जैसे पुरुष ही है जो अपने लाभ के लिए किसी के बगियाँ के फूल को असमय ही कुचल डालते है लेकिन वो सभ्य कहलाते है और ये अशभ्य ये हमारी मानसिकता है जिसमे बदलाव लाने का समय आ गया है हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। चकला घरो को शायद ही समाप्त किया जा सकता है यह पुरुषो की जरुरत बन चुकी है यह अनवरत चलने वाला एक पेशा बन चूका है अब लेकिन इन वैश्याओ के भी दर्द है जो साफ़ तौर पर चेहरे से झलकते है /कुछ आशाये और अभिलाषाएँ इनकी भी है। इन्होने भी कभी सोचा था की इनका भी एक अपना घर होगा इन्हे भी अच्छी नजर से देखा जायेगा क्योकि कोई खुद रंडी बनना नहीं चाहता। हलाकि देश में इनके पुनर्वाश के नाम से अरबो रूपये गैर सरकारी संगठनो को मुहैया करवाये जाते है लेकिन वो राशि इन तक ना पहुंच कर तथाकथित सभ्य लोगो तक ही रह जाती है और इनकी स्थिति जस की तस बनी रहती है ऐसी कई योजनाये जो इनके पुनर्वाश के लिए बनाई गई है वो कागजो तक ही सिमटी हुई है जरुरत है सभ्य समाज आगे बढे और अपने ही बीच रहने वाली इस आधी आबादी को भी बचाये ?
सोमवार, 9 फ़रवरी 2015
केजरीवाल की जीत के मायने ?
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत से जनता ने कुर्शी पर बिठा दिया है और इसी के साथ पिछले एक महीने से चली आ रही तमाम अटकलों पर भी विराम लग चूका है जनता ने केजरीवाल को पुरे पांच साल तक बेरोकटोक सरकार चलाने और वायदों पर खरा उतरने के लिए ही ऐसा बहुमत दिया है यह समझा जा सकता है गौर करने वाली बात है की क्या दिल्ली की जनता ने नरेंद्र मोदी को अस्वीकार कर दिया और दिल्ली में केजरीवाल की जीत से प्रधान मंत्री का ग्राफ निचे हुआ है जिस विजय अभियान पर भाजपा निकली थी उसपर केजरीवाल ने रोक लगा दिया है सायद ऐसा ही आम जनमानस सोचे लेकिन दिल्ली की जनता के कॉन्सेप्ट को समझना होगा की लोकसभा चुनाव में इसी जनता ने भाजपा को दिल से अपना बहुमत दिया और उसी जनता ने आखिर क्यों विधान सभा चुनाव में करारी सिकस्त दी . विचारणीय प्रश्न यह है की केजरीवाल की जीत वो भी इस बहुमत से क्यों हुई कि भाजपा के दिग्गज नेता धरासाई हो गए उसके लिए हमें नेपथ्य में जाना होगा .. दिल्ली में जबसे चुनाव की घोषणा हुई उसके बाद से ही भाजपा नेतृत्व उहापोह की स्थिति में थी चाहे वो मुख्य मंत्री के नाम की घोषणा को लेकर हो या फिर घोषणा पत्र के स्थान पर विज़न डॉक्यूमेंट का लाना पूरा का पूरा भाजपा नेतृत्व नरेंद्र मोदी के सहारे ही चुनाव जीतने की फ़िराक में लगा हुआ रहा और बाद में किरण बेदी डिक्टेटर की भूमिका में अचानक से प्रकट हो गई जिससे भाजपा के स्थापित नेताओ को झटका लगा वही केजरीवाल पर भाजपा द्वारा किये गए व्यक्तिगत हमले चाहे वो कार्टून के जरिये किये गए हो या फिर अन्य प्रचार माध्यमो से साथ ही पुरे कैबिनेट को सड़क पर प्रचार के लिए उतार देने के साथ साथ भाजपा नेताओ द्वारा हर दिन केजरीवाल से पूछे गए पांच सवालो ने भी केजरीवाल को आम आदमी का नेता बना दिया यही नहीं भाजपा ने केजरीवाल पर जो आरोप लगाये उसे केजरीवाल ने मतदाताओ के समक्ष ऐसे प्रस्तुत किया कि जनता को केजरीवाल में एक भगोड़ा नहीं एक ईमानदार नेता कि छवि दिखाई देने लगी और जनता केजरीवाल के दिखाए सब्जबाग में फस गई जिस केजरीवाल को प्रधान मंत्री अराजक कहते रहे उसी केजरीवाल को जनता ने सर आखो पर बिठा लिया केजरीवाल की पार्टी ने जो वायदे किये वो सीधे जनता से जुड़े मुद्दे थे और मतदाताओ ने दिल्ली की हित से अधिक स्वयं के हित को ध्यान में रख कर मतदान किया .जनता केजरीवाल जैसे बहुरुपिया कि जाल में फस चुकी है जो भारत माता कि जय तो बोलता है लेकिन कश्मीर के अलगाव वादियों का समर्थन भी करता है साथ ही दिल्ली कि मतदाता को पड़ोसियों का दर्द नहीं अपने स्वार्थ कि बलिवेदी पर सेकी गई रोटी का आनंद लेना बखूबी आता है इन्हे केंद्र कि एक मजबूत सरकार को कमजोर करने कि साजिश नहीं दिखाई देती .की कैसे ममता बनर्जी नितीश कुमार सहित तमाम विरोधियो के साथ साथ पडोसी देश भी सरकार की बढ़ती ताकत से भयभीत है . क्योकि जिस प्रकार की घोषणा केजरीवाल की पार्टी ने मतदाताओ से किया उसमे जनता ने स्वयं का हित देखा और प्रचंड बहुमत देकर विजयी तो बना दिया है अब केजरीवाल के समक्ष एक बड़ी चुनौती है कि जनता ने जो बहुमत दिया है उसपर वो खरे उतरे क्योकि पिछले 49 दिनों का अनुभव काफी ख़राब रहा है उसके बाबजूद यदि मतदाताओ ने अपना भविष्य आम आदमी पार्टी में देखा है तो उसपर खरे उतरने कि पूरी जबाब देहि अब नवनिर्वाचित सरकार कि बनती है वही भाजपा नेतृत्व को भी जमीनी स्तर पर आत्ममंथन करने कि आवश्यकता है कि आठ महीने में केंद्र सरकार ने जो काम किया है वो जनता के हित में कितना है और उसे जनता ने कितना स्वीकार किया क्योकि भाजपा नेतृत्व को यह समझना होगा कि भले ही संसद में विपक्ष कमजोर हो लेकिन सड़क पर विपक्ष आज भी मौजूद है और भ्रामक प्रचार प्रसार में पूरी तरह हावी है साथ ही संघ और उसके अनुसांगिक सगठनो को भी सोचना होगा कि जो बयान दिए जा रहे है उससे सरकार पर कैसा असर पड़ेगा .
बुधवार, 28 जनवरी 2015
कलंक कथा ?
किशनगंज पुलिस देह व्यापर के धंधे में लिप्त आठ लड़कियों को मुक्त करवाने में सफल हुई है साथ ही चार महिला दलाल और छह ग्राहक को भी गिरफ्तार किया है वही दो दलाल पुलिस को चकमा देने में सफल हो गए। आरक्षी अधीक्षक राजीव रंजन का कहना है कि गिरफ्तार महिला दलालो द्वारा ना सिर्फ अपनी बेटी से देह व्यापर का धंधा करवाया जा रहा था वरन अन्य जिलो से भी लड़कियों को यहाँ मंगाया जाता था यही नहीं मुक्त करवाई गई लड़कियों में दो मानसिक रूप से विछिप्त भी है गौरतलब हो की मंगलवार को देर रात पुलिस बहादुरगंज के प्रेम नगर में अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी मो कासिम के नेतृत्व में छापेमारी से यह सफलता मिली लेकिन सवाल उठता है की पिछले छह महीने में पुलिस ने चार दर्जन से अधिक लड़कियों को मुक्त करवाया उनका क्या हुआ ? समाज सेवी फरजाना बेगम की माने तो मुक्त करवाई गई लड़कीओ के लिए मात्र साल का छह हजार रुपया सरकार की और से निर्धारित है जिससे उनका कुछ होने वाला नहीं है जिस वजह से ये लडकिया पुनः उसी दलदल में जाने को मजबूर हो जाती है वही दलाल भी कमजोर कानून का सहारा लेकर छूट जाते है हलाकि कुछ लड़कियों को उनके परिजन अपना लेते है लेकिन सब उतनी भाग्य शाली नहीं होती। मालूम हो की देह व्यापर के दलाल किशनगंज को ट्रांजिट पॉइंट के रूप में इस्तेमाल करते है और अन्य जिलो के साथ साथ नेपाल बांग्लादेश और खाड़ी देशो से भी यहाँ के दलालो के तार जुड़े होने के कई मामले सामने आ चुके है और एक दर्जन से अधिक चिन्हित चकला घरो के अलावे यहाँ के होटल और कई सफ़ेद पोसो के घरो में भी धंधा बेरोकटोक चलता है। जरुरत है देह व्यापर में शामिल सफ़ेद पोसो को चिन्हित कर जेल के सलाखों के पीछे भेजने की साथ ही मुक्त करवाई गई लड़कियों के पुनर्वाश के ठोस व्यवस्था किये जाने की ताकि ये लडकिया भी बसंत का खुल कर आनंद ले पाये।
सोमवार, 19 जनवरी 2015
मेरे शहर में भी दंगा हुआ ?
बिहार का 75 फीसदी मुश्लिम आबादी वाला किशनगंज जिला जो अपने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए पुरे देश में अब तक जाना जाता रहा था लेकिन देखते देखते यहाँ के भाई चारे को भी ना जाने किसकी नजर लग गई जिस किशनगंज की पहचना कभी भगवान कृष्ण और महाभारत काल से जुड़े अवशेषों खेत खलिहानों के साथ साथ बाबा कमली साह के मजार तथा खगड़ा मेला के जरिये होती थी उसी के पहचान में एक धब्बा लग चूका था हिन्दू मुश्लिम दंगो के रूप में। 75 फीसदी मुश्लिम आबादी होने के बाबजूद भी जिले की भाईचारगी में कभी इस प्रकार का धब्बा नहीं लगा था। 1992 में अयोध्या आंदोलन के समय कुछ छिट पुट घटनाये जरूर हुए लेकिन वैमनष्य जल्द ही समाप्त हो गया था लेकिन 7 ओक्टुबर 2014 की रात में कुछ स्वार्थी तत्वों ने ऐसी आग लगाई की 8 ओक्टुबर की सुबह होते होते पुरे जिले में आग फ़ैल चुकी थी एक अजीब सा दहसत देखा जा सकता था। मैंने कभी इस तरह की घटनाओ को बतौर पत्रकार कवर नहीं किया था मेरे लिए यह बिलकुल नया अनुभव था । जिले के गली मुह्हले से हुजूम के हुजूम लोग निकले जा रहे थे जिनके अंदर के आक्रोश को समझा जा सकता था जिन्हे शायद किसी ने भड़काया था और भड़काने का नतीजा ऐसा हुआ की ये आगे पीछे कुछ नहीं सोच रहे थे जो दिखा उसकी पिटाई की हंगामा किया सड़क पर लगी छोटी मोटी दुकानो में तोड़ फोड़ की तो कही चार पहिया वाहनो में आग लगाई गई थी पुरे आठ घंटे तक यह तांडव चलता रहा तब तक एक समुदाय पूरी तरह खामोश था शायद उन्हें भी अपने नेता के सन्देश का इंतजार था उस समुदाय के उत्साही युवक भी कुछ कर गुजरना चाहते थे जो की उनकी बातो से साफ़ झलकता था इस बीच आठ घंटे बीत चुके थे जगह जगह घटनाये हो रही थी पुलिस की गाड़ियों के सायरन कानो में गूँज रहे थे जो की स्थिति के संवेदनशीलता को प्रकट कर रहे थे लेकिन समय रहते प्रसाशन ने कर्फु लगा दिया लेकिन इन आठ घंटो में मेरी मनः स्थिति क्या थी उसका वर्णन करना आवश्यक जान पड़ता है हंगामे के बीच ही जब में खबर प्रेषित करने घर लौटा तो रास्ते में ही मुह्हले के कुछ युवक मिल गए जो की दूसरी समुदाय के थे वो जानते थे की में एक पत्रकार हूँ उन्हें देख कर मेरे मन में अचानक ही एक अजीब सा डर पैदा हो गया हलाकि पूर्व में भी इन युवको से आमना सामना होता था लेकिन कभी ऐसी स्थिति से नहीं गुजरा था ना चाहते हुए भी में उनके पास रुक गया और उनका हाल चाल जाना जिससे मुझे यह अहसास हुआ की मुझे अविलम्ब अपनी पत्नी और बच्चो को सुरक्षित स्थान पर पंहुचा देना चाहिए आनन फानन में ही घर पहुंच कर बच्चो को तैयार करवाया और सुरक्षित ठिकाने तक पंहुचा दिया अब में अपने परिवार की सुरक्षा के और से कुछ सुरक्षित महसूस कर रहा था लेकिन घर वाले मुझे लेकर चिंतित दिखे जैसा की होता है भैया भाभी से लेकर सभी चिंतित थे और घर से बाहर ना जाने की सलाह दे रहे थे लेकिन अपने कर्तव्यो का निर्वहन आवश्य्क था क्योकि एक पत्रकार जो था। दिन ढल चूका था चारो और से पुलिस के सायरन की आवाज ही गूंज रही थी ना तो मंदिर में बजने वाले भजन पर आज ध्यान गया था ना ही अजान पर कान खड़े हुए थे मन में एक उथल पुथल मची हुई थी दिन तो बीत गया रात को क्या होगा उस दिन पूरी रात नींद नहीं आई थी। घटना को तीन महीने बीत चुके है परन्तु आज भी जब सोचता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते है / की मेरे सहर मे भी दंगा हुआ था। …. जारी
शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014
भगवान श्रीराम से जुड़े 10 गुप्त रहस्य......saffron
भगवान श्रीराम से जुड़े 10 गुप्त रहस्य......saffron
भारत का इतिहास क्रमश: पौराणिक पंडितों, मुगलों, अंग्रेजों, ईसाई मिशनरियों, धर्मांतरित लोगों और वामपंथियों द्वारा विकृत किया गया। सभी ने अपने-अपने हित के लिए भारत की प्राचीनता और गौरव के साथ छेड़छाड़ की। यहां के धर्म को विरोधाभाषी बनाया और अंतत: छोड़ दिया।
कुछ लोग कहते हैं कि राम भगवान नहीं थे, वे तो राजा थे। कुछ का मानना है कि वे रामायण नाम के एक उपन्यास के काल्पनिक पात्र हैं। वे कभी हुए ही नहीं। वर्तमान काल में भी राम की आलोचना करने वाले कई लोग मिल जाएंगे। राम के खिलाफ तर्क जुटाकर कई पुस्तकें लिखी गई हैं।
इन पुस्तक को लिखने वालों में वामपंथी विचारधारा और धर्मांतरण करने वालों और धर्मांतरित लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है। तर्क से सही को गलत और गलत को सही सिद्ध किया जा सकता है। तर्क की बस यही ताकत है। तर्क वेश्याओं की तरह होते हैं, जो किसी के भी पक्ष में जुटाए जा सकते हैं, लेकिन हम यहां तर्क की नहीं, तथ्यों की बात करेंगे।
कुछ लोग कहते हैं कि राम भगवान नहीं थे, वे तो राजा थे। कुछ का मानना है कि वे रामायण नाम के एक उपन्यास के काल्पनिक पात्र हैं। वे कभी हुए ही नहीं। वर्तमान काल में भी राम की आलोचना करने वाले कई लोग मिल जाएंगे। राम के खिलाफ तर्क जुटाकर कई पुस्तकें लिखी गई हैं।
इन पुस्तक को लिखने वालों में वामपंथी विचारधारा और धर्मांतरण करने वालों और धर्मांतरित लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है। तर्क से सही को गलत और गलत को सही सिद्ध किया जा सकता है। तर्क की बस यही ताकत है। तर्क वेश्याओं की तरह होते हैं, जो किसी के भी पक्ष में जुटाए जा सकते हैं, लेकिन हम यहां तर्क की नहीं, तथ्यों की बात करेंगे।
राम हुए या नहीं, इस पर कई शोध हुए। उनमें से एक शोध फादर कामिल बुल्के ने भी किया। उन्होंने राम की प्रामाणिकता पर शोध किया और पूरी दुनिया में रामायण से जुड़े करीब 300 रूपों की पहचान की।
'प्लेनेटेरियम' : राम के बारे में एक दूसरा शोध चेन्नई की एक गैरसरकारी संस्था भारत ज्ञान द्वारा कुछ वर्ष पूर्व पिछले 6 वर्षों में किया गया था। उनके अनुसार राम के जन्म को हुए 7,123 वर्ष हो चुके हैं। उनका मानना है कि राम एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। राम का जन्म 5,114 ईस्वी पूर्व हुआ था।
सरोज बाला, अशोक भटनागर और कुलभूषण मिश्र द्वारा लिखित एवं वेदों पर वैज्ञानिक शोध संस्थान (आई-सर्व) हैदराबाद द्वारा प्रकाशित 'वैदिक युग एवं रामायणकाल की ऐतिहासिकता : समुद्र की गहराइयों से आकाश की ऊंचाइयों तक के वैज्ञानिक प्रमाण' नामक शोधग्रंथ में भी इसका उल्लेख मिलता है।
वाल्मीकि रामायण में लिखी गई नक्षत्रों की स्थिति को 'प्लेनेटेरियम' नामक सॉफ्टवेयर से गणना की गई तो उक्त तारीख का पता चला। यह एक ऐसा सॉफ्टवेयर है, जो आगामी सूर्य और चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणी कर सकता है और पिछले लाखों वर्षों की ग्रह स्थिति और मौसम की गणना कर सकता है।
मुंबई में अनेक वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, व्यवसाय जगत की हस्तियों के समक्ष इस शोध को प्रस्तुत किया गया। और इस शोध संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए इसके संस्थापक ट्रस्टी डीके हरी ने एक समारोह में बताया था कि इस शोध में वाल्मीकि रामायण को मूल आधार मानते हुए अनेक वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, ज्योतिषीय और पुरातात्विक तथ्यों की मदद ली गई है। इस समारोह का आयोजन भारत ज्ञान ने आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के साथ मिलकर किया था।
कुछ वर्ष पूर्व वाराणसी स्थित श्रीमद् आद्य जगदगुरु शंकराचार्य शोध संस्थान के संस्थापक स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती ने भी अनेक संस्कृत ग्रंथों के आधार पर राम और कृष्ण की ऐतिहासिकता को स्थापित करने का कार्य किया था।
एक शोधानुसार लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो लव और कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व।
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पुस्तकें और ग्रंथ : नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में आज भी राम जिंदा हैं। दुनियाभर में बिखरे शिलालेख, भित्तिचित्र, सिक्के, रामसेतु, अन्य पुरातात्विक अवशेष, प्राचीन भाषाओं के ग्रंथ आदि से राम के होने की पुष्टि होती है।
रामायण : रामायण को वाल्मीकि ने राम के काल में ही लिखा था इसीलिए इस ग्रंथ को सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। रामायण और महाभारत यही ग्रंथ मूलत: हिन्दू इतिहास और राम व कृष्ण की प्रामाणिक जानकारी देते हैं। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है। इसके अलावा पुराणों में वर्णित इतिहास को मिथकीय रूप में लिखा गया है जिसमें तथ्यों की क्रमबद्धता नहीं हैं। दरअसल, यह कर्मकांड और पूजा-पद्धतियों पर आधारित इतिहास-कथाएं हैं।
रामचरित मानस : रामचरित मानस को गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा जिनका जन्म संवत् 1554 को हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अवधी भाषा में की। रामायण से अधिक इस ग्रंथ की लोकप्रियता है लेकिन यह ग्रंथ भी रामायण सहित अन्य ग्रंथों और लोक-मान्यताओं पर आधारित है।
अन्य भारतीय रामायण : तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि भारतीय भाषाओं में प्राचीनकाल में ही रामायण लिखी गई।
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विदेशी रामायण : कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलयेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलित हैं। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहां की भाषा में रामायण लिखी गई है। इससे पता चलता है कि रामकथा और राम का प्रभाव संपूर्ण धरती पर था।
श्रीलंका : श्रीलंका के संस्कृत एवं पाली साहित्य का प्राचीनकाल से ही भारत से घनिष्ठ संबंध था। भारतीय महाकाव्यों की परंपरा पर आधारित 'जानकी हरण' के रचनाकार कुमार दास के संबंध में कहा जाता है कि वे महाकवि कालिदास के अनन्य मित्र थे। कुमार दास (512-21ई.) लंका के राजा थे। इसे पहले 700 ईसापूर्व श्रीलंका में 'मलेराज की कथा' की कथा सिंहली भाषा में जन-जन में प्रचलित रही, जो राम के जीवन से जुड़ी है।
बर्मा और कंपूचिया : बर्मा को पहले ब्रह्मादेश कहा जाता था। रामकथा पर आधारित बर्मा की प्राचीनतम गद्यकृति 'रामवत्थु' है। लाओस में रामकथा पर आधारित कई रचनाएं हैं जिनमें मुख्य रूप से फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), ख्वाय थोरफी, पोम्मचक (ब्रह्म चक्र) और लंका नाई के नाम उल्लेखनीय हैं।
कंपूचिया की रामायण को वहां के लोग 'रिआमकेर' के नाम से जानते हैं, किंतु साहित्य जगत में यह 'रामकेर्ति' के नाम से विख्यात है।
इंडोनेशिया और जावा : संपूर्ण इंडोनेशिया और मलयेशिया में पहले हिन्दू धर्म के लोग रहते थे लेकिन फिलिपींस के इस्लामीकरण के बाद वहां भी हिन्दुओं का जब कत्लेआम किया गया और फिर सभी ने मिलकर इस्लाम ग्रहण कर लिया।
फिलिपींस की तरह वहां भी रामकथा को तोड़-मरोड़कर एक काल्पनिक कथा का रूप दिया गया। डॉ. जॉन आर. फ्रुकैसिस्को ने फिलिपींस की मारनव भाषा में संकलित इक विकृत रामकथा की खोज की है जिसका नाम 'मसलादिया लाबन' है।
रामकथा पर आधारित इंडोनेशिया के जावा की प्राचीनतम कृति 'रामायण काकावीन' है। काकावीन की रचना कावी भाषा में हुई है। यह जावा की प्राचीन शास्त्रीय भाषा है।
मलेशिया : मलयेशिया का इस्लामीकरण 13वीं शताब्दी के आस-पास हुआ। मलय रामायण की प्राचीनतम पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में 1633 ई. में जमा की गई थी। मलयेशिया में रामकथा पर आधरित एक विस्तृत रचना है 'हिकायत सेरीराम'। हिकायत सेरीराम विचित्रताओं का अजायबघर है। इसका आरंभ रावण की जन्म कथा से हुआ है। मलेशिया मूलत: रावण के नाना का आधिपत्य था।
चीन और जापान : चीनी रामायण को 'अनामकं जातकम्' और 'दशरथ कथानम्' ने नाम से जाना जाता है। इनमें रामायण के हर पात्र के नाम अलग हैं और चीन में रामकथा के मायने भी अलग हैं। 'अनामकं जातकम्' और 'दशरथ कथानम्' के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट थे और उनके पहले पुत्र का नाम लोमो था।
चीनी कथा के अनुसार 7,323 ईसा पूर्व राम का जन्म हुआ। जापान के एक लोकप्रिय कथा संग्रह 'होबुत्सुशू' में संक्षिप्त रामकथा संकलित है। यह कथा वस्तुत: चीनी भाषा के 'अनामकं जातकम्' पर आधारित है, किंतु इन दोनों में अनेक अंतर भी हैं।
मंगोलिया : चीन के उत्तर-पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को रामकथा की विस्तृत जानकारी है। वहां के लामाओं के निवास स्थल से वानर-पूजा की अनेक पुस्तकें और प्रतिमाएं मिली हैं। मंगोलिया में रामकथा से संबद्ध काष्ठचित्र और पांडुलिपियां भी उपलब्ध हुई हैं।
दम्दिन सुरेन ने मंगोलियाई भाषा में लिखित चार रामकथाओं की खोज की है। इनमें 'राजा जीवक की कथा' विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसकी पांडुलिपि लेलिनगार्द में सुरक्षित है। जीवक जातक की कथा का 18वीं शताब्दी में तिब्बती से मंगोलियाई भाषा में अनुवाद हुआ था।
तिब्बत : तिब्बत में रामकथा को किंरस-पुंस-पा कहा जाता है। वहां के लोग प्राचीनकाल से वाल्मीकि रामायण की मुख्य कथा से सुपरिचित थे। तिब्बती रामायण की 6 प्रतियां तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई हैं।
तुर्किस्तान : एशिया के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित तुर्किस्तान के पूर्वी भाग को खोतान कहा जाता है जिसकी भाषा खोतानी है। एचडब्लू बेली ने पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से खोतानी रामायण को खोजकर दुनिया के सामने लाया।
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शिलालेख और भित्तिचित्र : राम के काल में संपूर्ण भारत (कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक) और सीरिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार (बर्मा), लाओस, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया, सुमात्रा, जावा, इंडोनेशिया, बाली, फिलिपींस, श्रीलंका, मालदीव, मारिशस आदि जगहों पर राम पताका फहराई जाती थी।
हिंदेशिया का नाम बिगड़कर इंडोनेशिया हो गया। यहां पहले वानर जाति का राज था। इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप का नामकरण सुमित्रा के नाम पर हुआ था। मध्य जावा की एक नदी का नाम सेरयू है और उसी क्षेत्र के निकट स्थित एक गुफा का नाम किस्केंदा अर्थात किष्किंधा है।
लाओस, कंपूचिया और थाईलैंड के राजभवनों तथा बौद्ध विहारों की भित्तियों पर उकेरी गई रामकथा चित्रावली आज भी संरक्षित है। लाओस के लुआ प्रवा तथा वियेनतियान के राजप्रसाद में थाई रामायण 'रामकियेन' और लाओ रामायण फ्रलक-फ्रलाम की कथाएं अंकित हैं।
लाओस का उपमु बौद्ध विहार रामकथा-चित्रों के लिए विख्यात है। थाईलैंड के राजभवन परिसर स्थित वाटफ्रकायों (सरकत बुद्ध मंदिर) की भित्तियों पर संपूर्ण थाई रामायण 'रामकियेन' को चित्रित किया गया है।
कंपूचिया की राजधानी नामपेन्ह में एक बौद्ध संस्थान है, जहां खमेर लिपि में 2,000 तालपत्रों पर लिपिबद्ध पांडुलिपियां संकलित हैं। इस संकलन में कंपूचिया की रामायण की प्रति भी है।
थाईलैंड का प्राचीन नाम स्याम था और द्वारावती (द्वारिका) उसका एक प्राचीन नगर था। थाई सम्राट रामातिबोदी ने 1350 ई. में अपनी राजधानी का नाम अयुध्या (अयोध्या) रखा, जहां 33 हिन्दू राजाओं ने राज किया था।
थाईलैंड में लौपबुरी (लवपुरी) नामक एक प्रांत है। इसके अंतर्गत वांग-प्र नामक स्थान के निकट फाली (वालि) नामक एक गुफा है। कहा जाता है कि बालि ने इसी गुफा में थोरफी नामक महिष का वध किया था।
प्रशांत महासागर के पश्चिमी तट पर स्थित आधुनिक वियतनाम का प्राचीन नाम चंपा है। थाईवासियों की तरह वहां के लोग भी अपने देश को राम की लीलभूमि मानते है। उनकी मान्यता की पुष्टि 7वीं शताब्दी के एक शिलालेख से होती है जिसमें वाल्मीकि मंदिर का उल्लेख मिलता है जिसका पुनर्निमाण प्रकाश धर्म (653-679 ई.) नामक सम्राट ने करवाया था। शिलालेख इस मायने में अनूठा है, क्योंकि वाल्मीकि की जन्मभूमि भारत में भी उनके किसी प्राचीन मंदिर का अवशेष उपलब्ध नहीं है।
वियतनाम के बोचान नामक स्थान से एक क्षतिग्रस्त शिलालेख भी मिला है जिस पर संस्कृत में 'लोकस्य गतागतिम्' उकेरा हुआ है। दूसरी या तीसरी शताब्दी में उत्कीर्ण यह उद्धरण रामायण के अयोध्या कांड के एक श्लोक का अंतिम चरण है। संपूर्ण श्लोक इस प्रकार है-
क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठ: प्रत्युवाचह।
जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्यगतागतिम्।।
जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्यगतागतिम्।।
अर्थात : वियतनाम के त्रा-किउ नामक स्थल से प्राप्त एक और शिलालेख यत्र-तत्र-क्षतिग्रस्त है। इसे भी चंपा के राजा प्रकाश धर्म ने खुदवाया था इसमें वाल्मीकि का स्पष्ट उल्लेख है-
'कवेराधस्य महर्षे वाल्मीकि'।
'पूजा स्थानं पुनस्तस्यकृत:'।
'पूजा स्थानं पुनस्तस्यकृत:'।
अर्थात : तात्पर्य यह कि महर्षि वाल्मीकि का एक प्राचीन मंदिर था जिसका प्रकाश धर्म ने पुनर्निर्माण करवाया।
5
राम की वंश परंपरा : राम हुए हैं यह इस बात का सबूत है कि उनकी वंश परंपरा मिलती है। वंश परंपरा किसी कथा के काल्पनिक पात्र की नहीं होती। यह ऐसी वंशावली है जिसके वंशज दूसरे धर्म के भी ऐतिहासिक पुरुष माने जाते हैं और जिनका अपना अलग अस्तित्व है।
रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार है:- ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जलप्रलय हुआ था। वैवस्वत मनु के दस पुत्रों (इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध) में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी।
इक्ष्वाकु के तीन पुत्र थे- कुक्षि, निमि और दण्डक। निमि तो जैन धर्म के तीर्थंकर हैं। इक्ष्वाकु के पहले पुत्र कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुंधुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मांधाता हुए और मांधाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।
भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे। सगर के पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।
रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं। वाल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।
लुजियान यूनिवर्सिटी अमेरिका के प्रो. सुभाष काक ने अपनी पुस्तक 'द एस्ट्रोनॉमिकल कोड ऑफ ऋग्वेद' में श्रीराम के उन 63 पूर्वजों का वर्णन किया है जिन्होंने अयोध्या पर राज किया था। रामजी के पूर्वजों का वर्णन उन्होंने क्रमश: इस प्रकार किया- मनु, इक्ष्वाकु, विकुक्शी (शषाद), ककुत्स्थ, विश्वरास्व, आर्द्र, युवनाष्व (प्रथम), श्रावस्त, वृहदष्व, दृधावष्व, प्रमोद, हर्यष्व (प्रथम), निकुंभ, संहताष्व, अकृषाश्व, प्रसेनजित, युवनाष्व (द्वितीय), मांधातृ, पुरुकुत्स, त्रसदस्यु, संभूत, अनरण्य, त्राशदष्व, हर्यष्व (द्वितीय), वसुमाता, तृधन्व, त्रैयारूण, त्रिशंकु, सत्यव्रत, हरिश्चंद्र, रोहित, हरित (केनकु), विजय, रूरुक, वृक, बाहु, सगर, असमंजस, दिलीप (प्रथम), भगीरथ, श्रुत, नभाग, अंबरीष, सिंधुद्वीप, अयुतायुस, ऋतपर्ण, सर्वकाम, सुदास, मित्राशा, अष्मक, मूलक, सतरथ, अदिविद, विश्वसह (प्रथम), दिलीप (द्वितीय), दीर्घबाहु, रघु, अज, दशरथ और राम।
राम के बाद कुश का कुल चला। कुश से अतिथि, निषाध, नल, नभस, पुंडरीक, क्षेमधन्व, देवानीक, अहीनगु, परिपात्र, बाला, उकथ, वज्रनाभ, षंखन, व्युशिताष्व, विश्वसह (द्वितीय), हिरण्यनाभ, पुश्य, ध्रुवसंधि, सुदर्शन, अग्निवर्ण, शीघ्र, मरू, प्रसुश्रुत, सुसंधि, अमर्श, महाष्वत, विश्रुतवंत, बृहदबाला, बृहतक्शय और इस तरह आगे चलकर कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत में कौरवों की ओर से लड़े थे।
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सोने की लंका : श्रीलंका में वह स्थान ढूंढ लिया गया है, जहां रावण की सोने की लंका थी। ऐसा माना जाता है कि जंगलों के बीच रानागिल की विशालका पहाड़ी पर रावण की गुफा है, जहां उसने तपस्या की थी। रावण के पुष्पक विमान के उतरने के स्थान को भी ढूंढ लिया गया है।
श्रीलंका का इंटरनेशनल रामायण रिसर्च सेंटर और वहां के पर्यटन मंत्रालय ने मिलकर रामायण से जुड़े ऐसे 50 स्थल ढूंढ लिए हैं जिनका पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व है और जिनका रामायण में भी उल्लेख मिलता है।
श्रीलंका सरकार ने 'रामायण' में आए लंका प्रकरण से जुड़े तमाम स्थलों पर शोध कराकर उसकी ऐतिहासिकता सिद्ध कर उक्त स्थानों को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बना ली है। इसके लिए उसने भारत से मदद भी मांगी है।
वेरांगटोक जो महियांगना से 10 किलोमीटर दूर है वहीं पर रावण ने सीता का हरण कर पुष्पक विमान को उतारा था। महियांगना मध्य श्रीलंका स्थित नुवारा एलिया का एक पर्वतीय क्षेत्र है। इसके बाद सीता माता को जहां ले जाया गया था उस स्थान का नाम गुरुलपोटा है जिसे अब 'सीतोकोटुवा' नाम से जाना जाता है। यह स्थान भी महियांगना के पास है।
एलिया पर्वतीय क्षेत्र की एक गुफा में सीता माता को रखा गया था जिसे 'सीता एलिया' नाम से जाना जाता है। यहां सीता माता के नाम पर एक मंदिर भी है। इसके अलावा और भी स्थान श्रीलंका में मौजूद हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है।
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रामसेतु को बचाने की जरूरत : भारत के दक्षिण में धनुषकोटि तथा श्रीलंका के उत्तर-पश्चिम में पम्बन के मध्य समुद्र में 48 किमी चौड़ी पट्टी के रूप में उभरे एक भू-भाग के उपग्रह से खींचे गए चित्रों को अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (नासा) ने 1993 में दुनियाभर में जारी किया और इसे नाम दिया- एडम ब्रिज। ईसाई मान्यता अनुसार यह एडम ब्रिज है।
जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (नासा वैश्विक परिवर्तन मास्टर निर्देशिका) द्वारा दिए गए अनुमान के अनुसार पिछले 9,000 वर्षों में समुद्र सतह का स्तर लगभग 2.8 मीटर अर्थात 9.3 फीट बढ़ा है। वर्तमान में रामसेतु के अवशेष समुद्र सतह से लगभग इसी गहराई (9 से 10 फीट नीचे) पर पाए गए हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि वर्तमान में 7,000 ईसा पूर्व इस सेतु का प्रयोग भूमि मार्ग के रूप में किया जाता था। हजारों वर्ष पूर्व मानव द्वारा निर्मित सेतु का यह अकेला उदाहरण है।
रामसेतु के बारे में प्राचीनकाल से सभी लोग जानते थे लेकिन 2005 में इस पर ज्यादा बवाल मचा जबकि 2005 में भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना का ऐलान किया। भारत सरकार सेतुसमुद्रम परियोजना के तहत तमिलनाडु को श्रीलंका से जोड़ने की योजना पर काम कर रही है। इससे व्यापारिक फायदा उठाने की बात कही जा रही है। लेकिन यह परियोजना तभी पूरी होगी जबकि रामसेतु को तोड़ा जाए। मामला कोर्ट में होने के बावजूद रामसेतु के बहुत से हिस्से तोड़ दिए गए हैं।
रामकथा के लेखक नरेंद्र कोहली के अनुसार सरकार यह झूठ प्रचारित कर रही है कि राम ने लौटते हुए सेतु को तोड़ दिया था। जबकि रामायण के मुताबिक राम लंका से वायुमार्ग से लौटे थे, तो सोचें वे पुल कैसे तुड़वा सकते थे। रामायण में सेतु निर्माण का जितना जीवंत और विस्तृत वर्णन मिलता है, वह कल्पना नहीं हो सकता। यह सेतु कालांतर में समुद्री तूफानों आदि की चोटें खाकर टूट गया, मगर इसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता।
लालबहादुर शास्त्री विद्यापीठ के लेक्चरर डॉ. राम सलाई द्विवेदी का कहना है कि वाल्मीकि रामायण के अलावा कालिदास ने 'रघुवंश' के तेरहवें सर्ग में राम के आकाश मार्ग से लौटने का वर्णन किया है। इस सर्ग में राम द्वारा सीता को रामसेतु के बारे में बताने का वर्णन है इसलिए यह कहना गलत है कि राम ने लंका से लौटते हुए सेतु तोड़ दिया था।
वाल्मीक रामायण में वर्णन मिलता है कि पुल लगभग 5 दिनों में बन गया जिसकी लंबाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजन थी। रामायण में इस पुल को ‘नल सेतु’ की संज्ञा दी गई है। नल के निरीक्षण में वानरों ने बहुत प्रयत्नपूर्वक इस सेतु का निर्माण किया था। -(वाल्मीक रामायण- 6/22/76)।
वाल्मीकि रामायण में कई प्रमाण हैं कि सेतु बनाने में उच्च तकनीक प्रयोग किया गया था। कुछ वानर बड़े-बड़े पर्वतों को यंत्रों के द्वारा समुद्रतट पर ले आए थे। कुछ वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े हुए थे, अर्थात पुल का निर्माण सूत से सीध में हो रहा था। -(वाल्मीक रामायण- 6/22/62)
गीता प्रेस, गोरखपुर से छपी पुस्तक श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा 'सुख सागर' में वर्णन है कि राम ने सेतु के नामकरण के अवसर पर उसका नाम ‘नल सेतु’ रखा। इसका कारण था कि लंका तक पहुंचने के लिए निर्मित पुल का निर्माण विश्वकर्मा के पुत्र नल द्वारा बताई गई तकनीक से संपन्न हुआ था। महाभारत में भी राम के नल सेतु का जिक्र आया है।
अन्य ग्रंथों में कालिदास के रघुवंश में सेतु का वर्णन है। स्कंद पुराण (तृतीय, 1.2.1-114), विष्णु पुराण (चतुर्थ, 4.40-49), अग्नि पुराण (पंचम-एकादश) और ब्रह्म पुराण (138.1-40) में भी श्रीराम के सेतु का जिक्र किया गया है।
गोवा के राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ) में भू-वैमानिक समुद्र विज्ञान विभाग की प्राचीन जलवायु परियोजना के अध्यक्ष और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजीव निगम ने भी उपरोक्त की पुष्टि की थी। उन्होंने पिछले पंद्रह हजार वर्षों के दौरान समुद्र की सतह पर आए उतार-चढ़ाव और इनके किनारों पर बसी मानव बस्तियों पर इनके प्रभाव पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार उनकी रिपोर्टों से 7,500 और उसके बाद से जलमग्न हुए या तत्पश्चात भूमि से घिरे कई तटवर्ती पुरातात्विक स्थलों के अस्तित्व का पता चलता है। इनमें शामिल हैं- हजीरा, धोलावीरा, जूनी कुरन, सुरकोट्डा, प्रभास पाटन और द्वारका इत्यादि।
राजीव निगम के अनुसार समुद्र का जलस्तर 7 हजार से 7 हजार 200 वर्ष पूर्व (5000 से 5200 ईसा पूर्व) के आसपास मौजूदा स्तर से लगभग 3 मीटर नीचे था। वर्तमान में रामसेतु लगभग इतना ही नीचे पानी में डूबा है
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लव और कुश : भरत के दो पुत्र थे- तार्क्ष और पुष्कर। लक्ष्मण के पुत्र- चित्रांगद और चन्द्रकेतु और शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शूरसेन थे। मथुरा का नाम पहले शूरसेन था। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।
राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था।
राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश
शुक्रवार, 14 नवंबर 2014
किश ऑफ़ लव - सामाजिक विकृति
भारतीय सभ्यता और संस्कृति का लोहा पूरी दुनिया मानती आई है लेकिन हाल के दिनों में जिस प्रकार की घटना सामने आई उससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है की इस संस्कृति में कितनी विकृति आ गई है। दक्षिण भारत के कोच्चि से निकली किश ऑफ़ लव की हवा देखते देखते कोलकाता होते हुए जब दिल्ली पहुंची तो तमाम बुद्धिजीविओ और समाज सुधारको को चुनौती देने वाली साबित हुई साथ ही यह सोचने पर भी बिबस किया की आखिर जिन संस्कारो की दुहाई वर्षो से हम अपने बच्चो को देने की बात करते रहे आखिर उसे देने में कहा कमी रह गई। मामले के तह में जाये तो इस का आयोजन इस लिए किया गया था की एक प्रेमी जोड़े को कोच्चि में मौत के घाट उतार दिया गया था जिसके विरोध स्वरुप किश ऑफ़ लव का आयोजन किया गया था जिसे कही से जायज नहीं ठहराया जा सकता है ना तो उस प्रेमी जोड़े की हत्या की इजाजत दी जा सकती है और ना ही इस प्रकार के फूहड़पन फैलाते किश ऑफ़ लव जैसे आयोजन की क्योकि दोनों ही मामले पूरी तरह एक विकृत मानसिकता की परिचायक है। सोचने वाली बात यह है की आखिर हमारे देश की युवा पीढ़ी इतनी उच्श्रृंखल क्यों हो गई की कि उसे अपने परम्पराओ अपने धर्म अपनी संस्कृति का जरा भी धयान नहीं रहा और इस प्रकार के कुकृत को बढ़ावा देने लगे कही ना कही यह हमारी शिक्षा पद्दति का दोष है क्योकि वर्षो से हम जिस शिक्षा पद्दति को ढो रहे है वो हमें शिक्षित तो कर रही है लेकिन उसके साथ ही हमारा नुकसान कही अधिक कर रही है।
मंगलवार, 22 जुलाई 2014
सोशल मीडिया कितना सोशल ?
सोशल मीडिया का पोस्टमार्टम करने का विचार मन में आया तत्पश्चात लगभग 100 से अधिक युवक युवतियों द्वारा संचालित फेस बुक पेज का भ्रमण करने के बाद जो निष्कर्ष सामने आया उसके बाद कहा जा सकता है की भारतीय संस्कृति अपनी अंतिम साँस लेने के रास्ते पर बड़ी तेजी से बढ़ रही है ? शीला की जवानी से लेकर रूपा के घाघरे का बखान हमारी युवा पीढ़ी बेहतरीन ढंग से करने को आतुर दिखती है इन पेजो की नग्नता और फूहड़पन खुले आम दर्शाती है की कैसे युवाओ का नैतिक और चारित्रिक पतन हो रहा है। युवा पीढ़ी के कंधो के सहारे 21 वि सदी में भारत को विश्व गुरु बनाने का सपना संजोने वाले और संस्कृति की दुहाई देने वालो के नाक के निचे ही ये सारा खेल चल रहा है जहा आज की "युवती शाम होते ही कहती है की कौन कौन मुझे सेक्स चैट करना चाहता है मेरे इनबॉक्स में जल्दी कमेंट करो उसके बाद जैसे लड़को की बाढ़ सी आ जाती है यह संख्या सैकड़ो या हजारो में होती तो शायद समझा जा सकता था की कुछ लोग होंगे लेकिन यह संख्या लाखो और करोड़ो में है जिनकी चाहत और दीवानगी का आलम यह है की इन्हे पेज पर यह कहते तनिक भी शर्म महसूस नहीं होता की उन्होंने अपने परिवार के किस सदस्य के साथ कितनी बार सेक्स किया है और उन्हें कैसा महसूस हुआ और वो परिवार के किस सदस्य के साथ सेक्स करने को आतुर है और उसके लिए सलाह भी मांगते है। गौरतलब हो की वर्ष 1995 में इंटरनेट के प्रयोग को भारत में आम जनता के लिए आरम्भ किया गया था उस समय यह दुहाई दी गई थी की इसके प्रयोग से हम पुरे विश्व से विचारो का आदान प्रदान कर सकेंगे लेकिन हुआ इसके विपरीत कुछ ने इसे अपने कार्यो के लिए इस्तेमाल किया लेकिन अधिकांश जिनमे युवा पीढ़ी के साथ पौढ़ भी है ने इसे मात्र मनोरंजन का साधन समझा जहा हमें अच्छाई ग्रहण करना था हमने यूरोप और अमरीका की गन्दगी को अपनाने में अपनी बेहतरी समझी जिसका नतीजा है की भोग वादी प्रवृति का हममे इस प्रकार से प्रवेश हो चूका है की युवा पीढ़ी इसी को अपनी जिंदगी समझ रही है और मनोरंजन के बहाने अपना चारित्रिक पतन कर रहे है। एक युवा होने के नाते यह कहते तनिक भी झिझक नहीं की इन अश्लील पेज और साइट को देख कर किसी की भी इच्छा जागृत हो जाये क्योकि अश्लील साइट एक उत्प्रेरक का काम करते है और आज यह बीमारी का रूप ले रहे है जिसका नतीजा है की 3 साल की बच्चियां भी बलात्कार का शिकार हो रही है उसी देश में जहा नवरात्र में कुँवारी पूजा का प्रावधान है। ऐसे में यदि अविलम्ब इनपर रोक नहीं लगाया जाता तो स्थिति और भी ख़राब होगी हा कुछ लोग होंगे हममे और आप में जिन्हे यह अच्छा नहीं लगेगा और कहेंगे की छोटे कपडे पहने से कुछ नहीं होता सोच बदलनी चाहिए।
मंगलवार, 1 जुलाई 2014
मीडिया की आजादी संस्कृति के पतन की बड़ी वजह बन रही है ?
१९९५-१९९६ में वैश्वीकरण ने अपने पाव भारत में फैलाना आरम्भ किया इसके साथ ही भेड़ बकरियो की तरह समाचार चैनल बाजार में दिखने लगे क्योकि पुरे विश्व को भारत एक उभरते हुए बाजार के रूप में दिखाई दे रहा था और इस बाजार को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए प्रचार प्रसार की आवश्यकता थी जिसका नतीजा हुआ की कुकुरमुत्ते की तरह समाचार चॅनेल बाजार में उग आये। बड़े बड़े घरानो और नेताओ ने अन्य क्षेत्रो में निवेश से बेहतर मीडिया में निवेश को समझा क्योकि यहाँ खुले आम लूट की छूट थी कार्यपालिका से लेकर विधायिका तक में इसके द्वारा पैठ बनाना बहुत ही आसान कार्य था साथ ही राजनितिक आकाओ को खुस करने का भी यह एक बेहतर विकल्प था जिसका नतीजा हुआ की इन मीडिया घरानो ने धन की लालच में भारतीय संस्कृति पर ही प्रहार करना आरम्भ कर दिया और आज ऐसी स्थिति पर ये पहुंच चुके है की बाजार से लेकर सभी क्षेत्रो पर इनकी पकड़ काफी मजबूत हो गई है अब ये जैसा चाहते है वैसा ही हो रहा है सरकार बनाने गिराने से लेकर कीमतों के निर्धारण पर भी इनकी पकड़ मजबूत हो गई है क्योकि विदेशी कंपनिया ऐसा ही चाहती है की उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओ का विरोध ना हो . आज अगर कोई लड़कियों के पहनावे पर सवाल उठाता है तो मीडिया उसके पीछे हाथ धो कर पड़ जाती है स्वास्थ्य मंत्री यदि कंडोम की उपयोगिता से अधिक भारतीय मूल्यों को तरजीह देने की बात करते है तो मीडिया उनपर दिन भर ट्रायल चलता है l क्योकि इन्हे लगता है की इनकी कमाई मार खायेगी गौरतलब हो की इन मीडिया घरानो के आय का प्रमुख श्रोत आज कामोत्तेजक दवाई और कंडोम जैसे विज्ञापनों के प्रचार से प्राप्त हो रहा है ये पहले शराब का प्रचार कर कमाई करते है उसके बाद शराब छुड़ाने की दवाई का प्रचार कर इनके दोनों हाथ में लड्डू ही होता है यह हम नीरा राडिया जैसे मामलो से समझ सकते है . यही नहीं इन्होने भारतीय संत परम्परा को भी कटघरे में खड़ा करने का कुत्षित प्रयाश कई मामलो में किया जिससे इनकी नियत को समझा जा सकता है .अब सवाल उठाता है की भारतीय संस्कृति की अपनी गरिमा रही है मर्यादित आचरण को धेय मान कर ही हमारी संस्कृति फली फूली है पूरा विश्व हमारी संस्कृति का लोहा मानता रहा है लेकिन आज उसी संस्कृति पर क्षणिक लाभ की खातिर इनके द्वारा कुठराघात किया जा रहा है वो भी ऐसे समय में जब यूरोप और अमरीका हमारे आचरण को अंगीकार कर रहे हो वहा की लडकिया साड़ी को अपना प्रमुख वस्त्र बना रही हो और हिन्दुस्तानियो को बिकनी के तरजीह की सीख दी जा रही है क्या ये आस्चर्य का विषय नहीं है .अब सवाल उठाता है की इन पर कैसे अंकुश लगाया जाये ताकि प्रेस की स्वतंत्रता का भी हनन ना हो और हमारी संस्कृति भी बची रहे इसके लिय हमें ही प्रयाश करना होगा सरकार पर दबाब बना कर हो या अन्य मार्गो से की इनके द्वारा प्रसारित विज्ञापनों के देख रेख के लिए एक ऐसे सांस्कृतिक समूह का गठन किया जाये जिससे ये जो भी विज्ञापन का प्रसारण करे उससे पूर्व उस विज्ञापन की पूरी तरह जांचा परखा जाये उसके बाद ही प्रसारित किया जाये हलाकि नेशनल ब्रोडकास्ट एसोसिएशन जैसी संस्थाए मौजूद है लेकिन उनमे सिर्फ मीडिया घरानो के लोग ही है इसमें जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ साथ सभी क्षेत्रो के सदस्य होने चाहिए जिससे यह समूह कारगर साबित हो और मीडिया घरानो की मनमाने रवैये पर रोक लग सके ? हो सकता है अत्यधिकत उदारवादी और अंधी आधुनिकता के पैरोकारों को यह पसंद ना आये लेकिन अब बहुत कम समय बचा है इस विषय पर त्वरित करवाई की आवश्यकता जान पड़ती है .
शुक्रवार, 20 जून 2014
हंगामा है क्यों बरपा ?
भारतीय अर्थ व्यवस्था को मजबूत स्थिति प्रदान करने के उद्देश्य से कड़े निर्णय की बात कह कर प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बजट से पूर्व कड़ा निर्णय लेते हुए रेल भाड़ा में बढ़ोतरी कर दिया जिसे लेकर चहुंओर हंगामा मच गया है। लेकिन सवाल उठता है जब आप अच्छे दिन की कामना रखते है तो उसके लिए कुछ त्याग भी करना पड़ेगा क्योकि चुनाव से पूर्व जब मोदी जी ने बुलेट ट्रैन चलाने की बात कि थी तो आम जनमानस ने खूब तालिया बजाई थी अब यदि बुलेट ट्रैन को धरातल पर लाना है तो उसके लिए संसाधनो की आवश्यकता पड़ेगी जिसके लिए धन चाहिए और वो धन मोदी जी अपने घर से तो लाएंगे नहीं हमारे और आप के सहयोग से ही योजनाओ को अमली जामा पहनाया जायेगा ? इस लिए धैर्य रखने की आवश्यकता है और कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है यह क्यों भूल जाते है ?
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